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जानें कैसी है तापसी-भूमि की ‘सांड की आंख’, आप कितने देंगे स्टार?

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मूवी रिव्यू :     सांड की आंख
कलाकार :     तापसी पन्नू, भूमि पेडनेकर, प्रकाश झा, विनीत कुमार सिंह आदि
निर्देशक  :     तुषार हीरानंदानी
निर्माता   :     अनुराग कश्यप

दुनिया की सबसे बुजुर्ग शार्पशूटर प्रकाशी तोमर और चंद्रो तोमर पर आधारित फिल्म सांड की आंख 25 अक्तूबर को सिनेमाघरों में दस्तक देगी। तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर अभिनीत इस फिल्म की रिलीज से पहले तक कई सवाल जुड़े हुए थें। पहला सवाल, क्या महिला आधारित यह फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों की तरफ खींच पाएगी और दूसरा सवाल, क्या तापसी और भूमि अपने से करीब दोगुनी उम्र की महिलाओं के किरदार के साथ न्याय कर पाएंगी? फिल्म रिलीज होते ही इन दोनों ही सवालों के जवाब मिल चुके हैं। 

सांड की आंख बुजुर्ग शार्पशूटर प्रकाशी तोमर और चंद्रो तोमर के जीवन पर आधारित है। फिल्म में जहां तापसी ने प्रकाशी तो वहीं भूमि ने चंद्रो तोमर का किरदार अदा किया है। फिल्म की कहानी बागपत के जोहरी गांव से शुरू होती हैं जहां तापसी और भूमि की शादी एक ही घर में होती है। इस संयुक्त परिवार में घर के सबसे बड़े भाई रतन सिंह (प्रकाश झा) की ही चलती है। उनके फैसले के खिलाफ घर का कोई भी सदस्य नहीं जा सकता है। इसी बीच कहानी में दिल्ली से गांव वापस लौटे डॉक्टर यशपाल (विनीत कुमार सिंह) की एंट्री होती है। जो डॉक्टरी छोड़ गांव की बेहतरी करने के इरादे के साथ वहां एक शूटिंग रेंज खोलते हैं, और बच्चों को बुलाने के लिए गांव के सरपंच सतपाल सिंह के घर पहुंचते हैं। हालांकि सतपाल सिंह घर की लड़कियों को भेजने के लिए रजामंद नहीं होते हैं। लेकिन अपनी पोतियों के सुनहरे भविष्य और सरकारी नौकरी की चाह में प्रकाशी और चंद्रो छुपते-छुपाते अपनी पोतियों को लेकर शूटिंग रेंज पहुंच जाती हैं। 

अपनी पोतियों को प्रेरित करने के लिए वह दोनों बंदूक हाथ में उठा लेती हैं और एकदम सटीक निशाना लगा देती हैं।  दादियों को शूटिंग करता देख लड़कियों में भी उत्साह भर जाता है हालांकि घर की औरतों की यह चोरी लंबे समय तक छुपी नहीं रह पाती है। जिसके बाद कहानी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। फिल्म के अंत में महिला सशक्तिकरण का अच्छा संदेश दिया गया है। तापसी और भूमि की एक्टिंग दर्शकों को कभी हंसने पर तो कभी रोने पर मजबूर कर देती है। दोनों ही अदाकाराओं के साथ प्रकाश झा ने भी देसी हरियाणवी व्यक्ति का अच्छा किरदार निभाया है।  तुषार हीरानंदानी का निर्देशन भी इस फिल्म का एक मजबूत पक्ष है। फिल्म में जिस तरह से हरियाणा की पृष्ठभूमि को फिल्माया है वह काबिलेतारीफ है। कलाकारों और निर्देशक का अच्छा तालमेल देखने को मिलता है जिस वजह से छोटे-छोटे सीन्स भी पूरी कहानी बयां करते हैं। 

करीब 148 मिनट की कहानी से दर्शकों को बांधने में संगीत ने अहम योगदान दिया है। वुमनिया और उड़ता तीतर जैसे गाने कहानी के हिसाब से एकदम सटीक बैठते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है। कैमरा वर्क की बात करें तो पूरी कहानी में कई जगह ऐसे सीन्स शूट किए गए हैं जो सिल्वर स्क्रीन पर  बहुत ही खूबसूरत दिखता हैं। वहीं फिल्म के एक अहम हिस्से,  प्रोस्थेटिक की बात करें तो यह कई सीन्स में आंखों को चुभता है जो आम दर्शक भी आसानी से पकड़ लेते हैं। हालांकि तापसी और भूमि के अभिनय ने इस कमी को काफी हद तक फीका कर दिया। हमारे मूवी रिव्यू में फिल्म सांड की आंख को मिलते हैं पांच में से साढ़े तीन स्टार। 

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